राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण में कछुआ संरक्षण का बड़ा अभियान चंबल के तट पर जीवन की नई दस्तक
राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण में कछुआ संरक्षण का बड़ा अभियान चंबल के तट पर जीवन की नई दस्तक
मुरैना : राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण एक बार फिर देश में जैव विविधता संरक्षण की मिसाल बनकर उभर रहा है। चंबल नदी के 435 किलोमीटर लंबे संरक्षित क्षेत्र में इस वर्ष लगभग 8 से 9 हजार दुर्लभ कछुआ शावकों को प्राकृतिक विचरण के लिए नदी में छोड़ा गया है। ये शावक विलुप्तप्राय प्रजातियों बाटागुर-बाटागुर एवं बाटागुर डोंगौंका के हैं, जिन्हें बचाने के लिए पिछले एक दशक से विशेष संरक्षण परियोजना चलाई जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह दोनों प्रजातियां हार्ड शेल कछुओं की श्रेणी में आती हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संकटग्रस्त मानी जाती हैं। चंबल नदी के स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वातावरण में इनका संरक्षण न केवल जैव विविधता को सुरक्षित रखने का कार्य कर रहा है, बल्कि नदी की प्राकृतिक पारिस्थितिकी को भी मजबूत बना रहा है।
10 वर्षों से जारी है संरक्षण अभियान
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण क्षेत्र में वन विभाग और वन्यजीव संरक्षण संस्थाओं द्वारा विगत 10 वर्षों से इन दुर्लभ कछुओं के संरक्षण और संवर्धन का कार्य किया जा रहा है। इस परियोजना के तहत हर वर्ष हजारों अंडों को सुरक्षित कर कृत्रिम हैचिंग सेंटरों में रखा जाता है।
मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले के बरौली, मुरैना जिले के बटेश्वरा और उसैदघाट तथा भिंड जिले के ज्ञानपुरा क्षेत्र में नदी किनारे अस्थायी हैचिंग सेंटर बनाए जाते हैं। ये सेंटर लगभग पांच महीने तक संचालित रहते हैं, जहां कछुओं के अंडों को सुरक्षित वातावरण में रखा जाता है।
वन अधिकारियों के अनुसार मादा कछुए नदी के किनारे रेत में अंडे देती हैं। प्राकृतिक परिस्थितियों में कई बार ये अंडे बाढ़, शिकारियों या मानव हस्तक्षेप के कारण नष्ट हो जाते हैं। इसी खतरे को देखते हुए कृत्रिम हैचिंग केंद्रों की स्थापना की गई, ताकि अंडों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
कैसे होती है हैचिंग प्रक्रिया
कृत्रिम हैचिंग केंद्रों के दोनों ओर लगभग पांच-पांच किलोमीटर क्षेत्र तक नदी तट की निगरानी की जाती है। वनकर्मी और विशेषज्ञ मादा कछुओं द्वारा दिए गए अंडों को सावधानीपूर्वक एकत्रित कर सुरक्षित स्थानों पर रखते हैं।
एक हैचिंग सेंटर में सामान्यतः 50 से 60 घोंसले सुरक्षित रखे जाते हैं। प्रत्येक घोंसले में लगभग 20 से 30 अंडे होते हैं। इस प्रकार हर वर्ष 10 हजार से अधिक अंडों की हैचिंग की जा रही है।
विशेष बात यह है कि अंडों से बाहर आने के कुछ घंटों के भीतर ही नन्हे कछुआ शावक नदी की ओर बढ़ने लगते हैं। वे किनारे पर आने वाली लहरों के विपरीत दिशा में तैरते हुए नदी में प्रवेश करते हैं। यह दृश्य वनकर्मियों और पर्यावरण प्रेमियों के लिए बेहद रोमांचक होता है।
हाल ही में उसैदघाट हैचिंग सेंटर पर एक ही सुबह में लगभग 52 शावक अंडों से बाहर निकले। वन विभाग ने उन्हें तुरंत चंबल नदी में छोड़ दिया ताकि वे प्राकृतिक जीवन शुरू कर सकें।
बरही घाट बना विशेष पालन केंद्र
भिंड जिले के बरही घाट पर पिछले दो वर्षों से एक बड़ा पालन एवं संरक्षण केंद्र संचालित किया जा रहा है। यहां नदी से लाए गए सैकड़ों कछुआ शावकों को संरक्षित वातावरण में रखा जाता है।
इस केंद्र पर देश की एक अशासकीय वन्यजीव संस्था द्वारा लगातार अध्ययन भी किया जा रहा है। वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि कछुओं की वृद्धि, भोजन, प्रवास और जीवित रहने की दर को किस प्रकार बेहतर बनाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती अवस्था में शावकों को सुरक्षित वातावरण मिल जाए तो उनके जीवित रहने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यही कारण है कि बरही केंद्र को इस परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
घड़ियाल के साथ कछुओं का भी संरक्षण
चंबल नदी लंबे समय से घड़ियाल संरक्षण के लिए प्रसिद्ध रही है। यहां देश की सबसे बड़ी घड़ियाल आबादी पाई जाती है। अब उसी क्षेत्र में कछुओं के संरक्षण को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है।
वन विभाग का कहना है कि चंबल नदी का स्वच्छ जल और कम औद्योगिक प्रदूषण इन जीवों के लिए आदर्श वातावरण तैयार करता है। यही कारण है कि यहां कई दुर्लभ जलीय प्रजातियां आज भी सुरक्षित हैं।
कछुए नदी के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। वे नदी में मौजूद जैविक अपशिष्ट और मृत जीवों को खाकर जल को स्वच्छ बनाए रखने में मदद करते हैं। इसलिए विशेषज्ञ इन्हें “प्राकृतिक सफाईकर्मी” भी कहते हैं।
जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण कदम
पर्यावरणविदों के अनुसार यदि किसी नदी में कछुए, घड़ियाल और डॉल्फिन जैसी प्रजातियां स्वस्थ संख्या में मौजूद हों, तो यह उस नदी के बेहतर पारिस्थितिक स्वास्थ्य का संकेत माना जाता है।
चंबल नदी में चल रहा यह संरक्षण अभियान न केवल दुर्लभ प्रजातियों को बचाने का प्रयास है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
वन अधिकारियों का कहना है कि आगामी वर्षों में सॉफ्ट शेल कछुओं के संरक्षण की योजना भी शुरू की जाएगी। इसके लिए विशेष अध्ययन और संसाधनों की तैयारी की जा रही है।
स्थानीय लोगों की भी बढ़ रही भागीदारी
इस परियोजना में स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी भी बढ़ रही है। कई गांवों के लोग अब कछुओं के अंडों और घोंसलों की जानकारी वन विभाग को देने लगे हैं। इससे अंडों की सुरक्षा में काफी मदद मिल रही है।
वन विभाग समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित करता है, जिनमें ग्रामीणों को बताया जाता है कि कछुए और अन्य जलीय जीव नदी के स्वास्थ्य के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सरकारी प्रयासों से संरक्षण संभव नहीं है। जब तक स्थानीय समाज और युवा पीढ़ी इसमें सक्रिय भागीदारी नहीं निभाएंगे, तब तक दीर्घकालिक सफलता मिलना कठिन होगा।
चंबल संरक्षण की नई पहचान
एक समय डकैतों की वजह से चर्चाओं में रहने वाली चंबल घाटी आज वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता की नई पहचान बन रही है। घड़ियाल, डॉल्फिन और दुर्लभ कछुओं की बढ़ती संख्या यह संकेत दे रही है कि संरक्षण प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
यदि इसी प्रकार वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और संवर्धन कार्य जारी रहा तो आने वाले वर्षों में चंबल नदी देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण मीठे पानी के जैव विविधता क्षेत्रों में शामिल हो सकती है।
“राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण क्षेत्र में दुर्लभ कछुआ प्रजातियों के संरक्षण के लिए लगातार कार्य किया जा रहा है। हर वर्ष हजारों अंडों की सुरक्षित हैचिंग कर शावकों को प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा जाता है। आने वाले समय में सॉफ्ट शेल कछुओं के संरक्षण की दिशा में भी विशेष योजना शुरू की जाएगी।”
— श्याम सिंह चौहान, अधीक्षक राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण मुरैना

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